जिन्हें दुनिया अब तक सबसे पक्का दोस्त मानती थी, उन दो देशों के राष्ट्रप्रमुखों के बीच ईरान युद्ध को लेकर गहरी नाराजगी और दरार सामने आ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) के बीच एक टेलीफोन कॉल पर इतनी तीखी बहस हुई कि मामला खत्म होने के बाद नेतन्याहू बेहद परेशान और बेचैन नजर आए। अमेरिकी खोजी वेबसाइट एक्सियोस (Axios) ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि इस बातचीत के बाद “ऐसा लगा जैसे नेतन्याहू के बालों में आग लगी हो।”
बहस के दौरान ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि इस समय इजराइल में उनकी लोकप्रियता (Rating) 99 फीसदी है और वे चाहें तो वहां प्रधानमंत्री पद का चुनाव भी लड़ सकते हैं।
ट्रंप और नेतन्याहू के बीच अनबन के 3 मुख्य कारण
दोनों नेताओं के बीच ईरान नीति को लेकर तीन बड़े मुद्दों पर सीधा टकराव है:
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बातचीत की अवधि: ट्रंप चाहते हैं कि युद्ध को टालने के लिए ईरान के साथ कम से कम 30 दिनों तक कूटनीतिक बातचीत (Dialogue) की जाए। इसके उलट नेतन्याहू का मानना है कि इस समय बातचीत करने का मतलब ईरान को और मजबूत होने का मौका देना है।
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लेटर ऑफ इंटेंट (Letter of Intent): ट्रंप की कोशिश है कि अमेरिका और ईरान जल्द से जल्द एक 'लेटर ऑफ इंटेंट' पर दस्तखत कर दें ताकि युद्धविराम को स्थायी रूप दिया जा सके। वहीं नेतन्याहू को लगता है कि ईरान इस लेटर के बहाने सिर्फ समय खरीद (Buying Time) रहा है।
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रणनीति में बुनियादी फर्क: डोनाल्ड ट्रंप का अब मानना है कि ईरान को पूरी तरह तबाह करने या घुटनों पर लाने की जिद से बेहतर है कि उसे कड़े नियमों के तहत काबू (Contain) में रखा जाए। वहीं, इजराइली पीएम नेतन्याहू इस समय पूरी तरह युद्ध के मूड में दिखाई दे रहे हैं।
क्या है 'ईरान पीस प्रपोजल' (Iran Peace Proposal)?
जब पश्चिम एशिया में महायुद्ध का खतरा मंडराने लगा, तब दुनिया को तबाही से बचाने के लिए पांच बड़े देशों—कतर, पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्किये और मिस्र—ने मिलकर एक नया शांति समझौता तैयार किया है, जिसे 'ईरान पीस प्रपोजल' नाम दिया गया है। इस पूरे प्रपोजल में पाकिस्तान सबसे बड़े मध्यस्थ (Chief Mediator) की भूमिका निभा रहा है।
इस शांति प्रस्ताव के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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30 दिनों का कूलिंग-ऑफ पीरियड: प्रस्ताव के तहत अमेरिका और ईरान के बीच तुरंत 30 दिनों के लिए सभी सैन्य गतिविधियां रोककर कूटनीतिक बातचीत शुरू की जाएगी।
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शुरुआती सहमति (Letter of Intent): दोनों पक्ष पहले एक संक्षिप्त और बुनियादी मसौदे पर हस्ताक्षर करेंगे, जिसके बाद परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों पर विस्तृत चर्चा होगी।
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यूरेनियम संवर्धन पर नियंत्रण: ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को एक निश्चित सीमा से आगे नहीं बढ़ाएगा, बशर्ते अमेरिका उस पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों में ढील देने पर राजी हो।
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सुरक्षित अंतरराष्ट्रीय व्यापार: इसके बदले में ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकरों और जहाजों की सुरक्षित आवाजाही की गारंटी देगा।
जहां एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस शांति प्रस्ताव के जरिए मिडिल ईस्ट में अपनी कूटनीतिक जीत देख रहे हैं, वहीं इजराइल इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानकर इसका कड़ा विरोध कर रहा है।